भारत में प्लाइवुड उद्योग में कच्चे माल की उचीं कीमतेंः एक संक्षिप्त अवलोकन - श्री समीर गर्ग, प्रबंध निदेशक, एसआरजी (सुमित्रा राजकृपाल ग्रुप)

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हाल ही में हुए कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद कई उद्योग हालात का सामना करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। और, यह कहना बिलकुल गलत नहीं होगा कि प्लाइवुड उद्योग इस चिंता का अपवाद नहीं है। प्लाइवुड उद्योग व् व्यापार ने इस समस्या पर अपनी प्रतिक्रिया दी है, और व्यापारियों में काफी अशांति पैदा की है।

इस स्पष्ट मूल्य वृद्धि के बारे में, एक संक्षिप्त बातचीत में श्री समीर गर्ग, प्रबंध निदेशक, एसआरजी (सुमित्रा राजकृपाल ग्रुप) ने कारणों पर गहराई से प्रकाशा डाला, और बताया कि रॉ मेटेरियल की बढ़ती कीमतों ने प्लाइवुड उद्योग के विकास को काफी ज्यादा प्रभावित किया है। श्री समीर गर्ग ने अपनी कंपनी के अंतर्राष्ट्रीय पहुंच में तेजी से विस्तार किया हैं, और उनकी कंपनी एसआरजी 10 से अधिक देशों में मौजूद है।

आगे बढ़ते हुए, सुमित्रा राजकृपाल समूह (एसआरजी) ने अपनी विश्वसनीयता बनाए रख कर एशियाई उपमहाद्वीप में अपने वैल्यू ड्रिवेन व्यवसाय को बढ़ाते  हुए इस क्षेत्र में एक अग्रणी कंपनी के रूप में उभरे है।‘‘एसआरजी प्लाई एंड बोर्ड्स’’ के रूप में इनके ब्रांड का नाम काफी लोकप्रिय है और बाजार में अच्छी तरह स्थापित है। इनके पास डीलरों/ डिस्ट्रीब्यूटरों का एक बहुत बड़ा नेटवर्क है।

भारत में प्लाइवुड उद्योग को आप कैसे देखते हैं?

भारत, ना केवल एशिया-प्रशांत में बल्कि दुनिया भर में लकड़ी की प्रमुख उपयोगकर्ताओं में से एक है। जुआन पाब्लो क्विनोनेज मोंटिएल, 2016 द्वारा ‘‘भारत के प्लाइवुड बाजार का विश्लेषण-विदेशी और फिनिश कंपनियों के लिए अवसर‘‘ पर किये गए अध्ययन के अनुसार, 2011-2018 के दौरान, प्लाइवुड उद्योग में सालाना औसतन 4.76 फीसदी की वृद्धि हुई है, लेकिन, चूंकि लकड़ी एक कच्चा माल है, इसलिए इसकी उपलब्धता की दिक्क्तें प्लाइवुड उद्योग के कामकाज में बाधक है। अन्य देशों की तुलना में, यहां प्लाइवुड का आयात उतना नहीं है क्योंकि इसकी उतनी जरूरत नहीं है। 

 

लेकिन, जब उत्पादन की बात आती है, तो भारत ब्राजील, कनाडा और फिनलैंड जैसे अन्य देशों को पछाड दिया है। उत्पादन का लगभग 90 फीसदी भारतीय इन्ड यूजर के बीच ही बेचा जाता है-यहीं कारण है कि यह मुख्य रूप से स्थानीय स्तर पर बड़ी मात्रा में निर्मित होते है। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात बढ़ाने की बात आती है, तो भारत के प्लाइवुड उद्योग में काफी संभावनाएं देखी जा सकती हैं।

प्र. कोविड-19 के बाद प्लाइवुड उद्योग को किन किन चुनौतियों का सामना करना पड. रहा हैं?

ेविड-19, महामारी ने दुनिया भर के उद्योगों पर बहुत ज्यादा असर डाला है। सभी विक्रेताओं को महामारी के दौरान (विशेषकर दूसरी लहर में) काफी ज्यादा कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करना पड़ा। वैश्विक स्तर पर व्यापक प्रकोप के कारण कच्चे माल, जो उद्योग के कामकाज के लिए बहुत जरूरी हैं, की भारी कमी है और कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। 

 

आन े वाली तीसरी लहर की आश ंका न े भी काफी अनिश्चितता प ैदा की ह ै। इसक े चलत े र्कइ  ला ेगा े ं क े मन म े ं एक द ूसर े क े प्रति स ंद ेह भी प ैदा ह ुआ ह ै। निर्मा ताआ े ं आ ैर आयातका े ं क े पास रणनीतिया े ं की कमी ह ै आ ैर र्कइ  अभी भी उन उपाया े ं क े बार े म े ं सा ेच नही ं पा रह े ह ै ं, जा े उनक े अपन े व्यवसाय का े पटरी पर लान े म े ं सहायक हा े आ ेर जिस े व े अपना सकें।

कोविड-19 का प्रभाव लॉजिस्टिक पर काफी ज्यादा महसूस
 किया गया, क्योंकि इसके चलते आयात और निर्यात काफीज्यादा प्रभावित हुए। आयात किये जाने वाले मेटेरियल की भारी कमी थी। यदि आयात होता, तो वह अपेक्षाकृत काफी ज्यादा खर्चीला होता।

आप अंतरराष्ट्रीय कारकों के साथ-साथ स्थानीय कारकों के क्या प्रभाव देखते हैं?

अंतर्राष्ट्रीय स्तर परः अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर माल ढुलाई और परिवहन का खर्च काफी ज्यादा बढ़ गया है। निर्माता कच्चे माल और मेलामाइन, फिनोल और फॉर्मल्डिहाइड जैसे प्रमुख केमिकल प्रतिस्पर्धी मूल्य पर हासिल करने के लिए नएअवसर की तलाश कर रहे हैं। वास्तव में, यह एक अकेला फैक्टर प्लाइवुड उत्पादों की कीमत में समग्र रूप से वृद्धि की लहर प्रभाव पैदा कर रहा है। निर्माता अपने उत्पादों की कीमतों में वृद्धि करने को मजबूर हैं, पर बाद में यह एक बड़ी दुविधा बन जाती है क्योंकि लोग अधिक कीमत वाले सामान खरीदने को तैयार नहीं होते हैं।

राष्ट्रीय स्तर परः अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयात में कमी को देखते हुए सरकार ने कंपनियों को राहत देने के लिए कदम बढ़ाया है। प्लाइवुड कंपनियों ने प्लाइवुड व्यवसाय की हर जरूरतों और मांगों को पूरा करने की कोशिश की और महामारी से हुए नुकसान की भरपाई के लिए काम किया है। लेकिन प्लाइवुड उद्योग के विशाल आकार को देखते हुए नुकसान की भरपाई होना अभी बाकी है। घरेलू निर्माताओं के हस्तक्षेप के कारण अभी भी काफी उम्मीद है, जो वसूली प्रक्रिया में तेजी ला रहे हैं। भले ही कीमतें स्थिर होना अभी बाकी है, पर निकट भविष्य में प्लाइवुड उद्योग के विकास की काफी संभावनाएं है।

प्र. चुनौतियों को हल करनें के क्या उपाय हैं?

प्लाइवुड उद्योगों के बीच अब कड़ी प्रतिस्पर्धा है और बाजार में थोडा भी ग्रोथ दिखनें के लिए कुछ बदलाव अब बहुत जरूरी हैं। उद्योग के सतत विकास को बनाए रखने के लिए, सबसे पहली जरूरत स्थिरता है जो कि इनपुट कॉस्ट और सेल्स प्राइस के बीच उचित अंतर बरकरार रखकर किया जा सकता है।

अन्य देशों की तुलना में, यहां प्लाइवुड का आयात उतना नहीं है क्योंकि इसकी उतनी जरूरत नहीं है। लेकिन, जब उत्पादन की बात आती है, तो भारत ब्राजील, कनाडा और फिनलैंड जैसे अन्य देशों को पछाड दिया है। उत्पादन का लगभग 90 फीसदी भारतीय इन्ड यूजर के बीच ही बेचा जाता है-यहीं कारण है कि यह मुख्य रूप से स्थानीय स्तर पर बड़ी मात्रा में निर्मित होते है।

निम्नलिखित उपायों के माध्यम से सरकारी सहायता प्राप्त की जा सकती है।

जीएसटी की मौजूदा दर 18 फीसदी है, यदि सरकार इसे 12 फीसदी तक कम करे तो यह उद्योग के लिए फायदेमंद होगा।

 फेस, जो प्लाइवुड की बाहरी परत होती है, जिसका काम सिर्फ प्लाइवुड को सुन्दर बनाना होता है। यहm आईएसआई मानकों का एक हिस्सा है जो निर्माताओं के लिए बिना मतलब का खर्च है जिसका बोझ इन्ड यूजर पर पडता है। इसलिए, अंतरराष्ट्रीय बाजार द्वारा अपनाई जाने वाली प्रणाली के अनुसार इसे समाप्त कर देना चाहिए।

प्लाइवुड उद्योग में उपयोग किए जाने वाले आईएसआई मानक वर्षों से उद्योग का हिस्सा रहे हैं, लेकिन समय के अनुरूप नहीं हैं। यह प्लाइवुड उद्योग के लिए तभी फायदेमंद होगा जब इन मानकों की समीक्षा की जा सकेगी है और वर्तमान बाजार की स्थिति के अनुसार अपडेट किया जा सकेगा ताकि यह आज की जरूरतों को पूरा कर सके।

प्लाईवुड उद्योग में बड़ी संख्या में बड़े और छोटे निर्माता शामिल हैं, जिनमें से अधिकांश संगठित या संबद्ध नहीं हैं। यदि ये निर्माता संबद्ध होते तो एक चैनलाइज्ड पैटर्न में काम कर सकते, जिससे बेहतर उत्पादन के साथ, निर्माताओं के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होती और इन्ड यूजर्स को समग्र रूप से लाभ मिल पाता।

आज के बाजार में सतत विकास और स्थिरता ही सब कुछहै। हालांकि, निर्माता खुद प्रतिकूलता स्थिति में हैं क्योंकि वे अपने कॉस्ट प्राइस को भी वसूल नहीं कर पा रहे हैं, मार्जिन को तो छोड़ ही दें। प्लाइवुड उद्योग पर ज्यादा से ज्यादा सरकारी हस्तक्षेप और अधिक ध्यान देने से यह क्षेत्र निश्चित रूप से फले फूलेगा और अर्थव्यवस्था के एक अनिवार्य हिस्से के रूप में अपनी भूमिका निभाता रहेगा।
 

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